एक ओळ माझीही
Wednesday, December 30, 2015
बाजार
ना तो मै हकिकत-ए-इश्क हू,ना तो फरेब तेरि आन्खो का.
दिल मे उतरती हु ,तो जिन्दगी मे बुलाते हो..
बाद आने के बाजार-ए-इश्क मे सरेआम बेच देते हो..
©राम मोरे/३०१२२०१५१९१४
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