एक ओळ माझीही
Tuesday, December 15, 2015
अस्तित्व
सुर्याखाली राहिलो उभा ऐन दुपारी,
सावलिही दिसली नाही माझी मजला...
समजले मग अस्तित्व शुन्य जगात या माझे.....
©राम मोरे /१११२२०१५
Li
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